तारों की छाँव

तारों की छाँव में बैठी थी ,
चुपचाप गुमसुम सी छत पर ,
सोच रही बातें करती हूँ इनसे ,
सब जाने – पहचाने अपने से लगते है ,
रात के अँधेरे में मुझसे पूछते है क्या सोच रही ,
कहते है मैं हूँ न जीवन में रौशनी के लिये फिर अंधरे से कैसा डर . . .

छाया

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