विचलित मन

जब हम दूसरों की बातों को,
हद से ज्यादा सुनते सोचते है,
तब मन विचलित होता है,
खुद की अहमियत भूल जाते है,
हृदय कुंठाओं से ग्रसित होता है,
तब मन विचलित होता है,
अपने जीवन को दूसरों की नज़रों से देखे,
निष्कर्ष निकाले तब मन विचलित होता है . . .

छाया

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