एक उम्मीद

तुम्हारी यादों का गुलदस्ता लिये,
पूरे दिवस अपने स्मरण में तुम्हें,
आने का न्योता देती हूँ पर फिर,
जिस-जिस दिन आना भूल गये,
मैं खुद को सँवारना ही भूल गयी,
मुस्कुराहट मेरी ओंठों से रूठ गयी,
तुम्हारी यादों का गुलदस्ता लिये पूरे दिवस  . . .

छाया

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