चाँद सुनो ना

चाँद सुनता कहाँ ,
मेरी हर बात, 
जानता है ख्वाहिशों को,
हर शाम आता है फलक पर,
बस मुझसे मिलने और मैं एकटक,
देखती ही रहती हूँ तारों के बीच इठलाते चाँद को . . .

छाया

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