बिखरे लम्हों

बिखरे लम्हों को,
समेटने की कोशिश रहती हरपल,
कभी आँचल छोटा हो जाता हैं,
कभी लम्हों का बोझ आँचल,
उठा ही नही पाता सोचती हूँ आँचल,
पसारे रहूँ कभी तो समेट पाउँगी . . .

छाया

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