मोहब्बत का नशा

मोहब्बत के नशे में,
चूर हैं वो कुछ सूझता ही नही,
क्यों हाथ जाते बार-बार कर्णबाली,
बिंदी काजल लाली बिखरे लटों पर,
दर्पण से पूछती रहती वो प्रश्न बार – बार,
आँचल सरक-सरक ढलक जाते ठौर ही भूले जाते . . .

छाया

%d bloggers like this: