तुम नही आये

तुम नही आये तो फूलों की सारी,
पंखुडियां अलग हो कर बिखर सी गयी,
अपने केशों में सजाना चाहती थी उन्हें,
उसकी सुगंध से सुरभित होना चाहती थी,
तुम्हारी आँखों में खुद को देखना चाहती थी,
देखना चाहती थी कि काजल बिखर तो नही गये,
बिंदी ललाट पर चमक रहे या बिखर गये विरह वेदना में,
तुम आते तो फिर संवर जाती सारे स्वप्न को आँचल में बाँध लेती . . .

छाया

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