गुमसुम

गुमसुम सी रहती हूँ,
बहुत कुछ कहना था,
कहाँ कुछ बोल पाती हूँ,
कमरे की दिवारों से पूछा करती हूँ,
क्या जानते हो कौन हूँ मैं क्या अस्तित्व है मेरा,
वो भी कुछ नही कहती बस मेरा नाम ही तो बता पाती है . . .

छाया

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